
डॉ अत्रि भारद्वाज 2024-06-14 काशी पत्रकार संघ के तत्वावधान में हिंदी पत्रकारिता दिवस पर पराड़कर स्मृति भवन में "पत्रकारिता से मीडिया तक का सफ़र" विषयक संगोष्ठी में सारगर्भित चर्चा करते हुए आत्मविश्लेषण भी किया गया। आजादी के पहले की पत्रकारिता में राष्ट्रीय चेतना की अनुभूति होती थी परन्तु समय परिवर्तनशील है और हिंदी पत्रकारिता कई ठहरावों से होते हुए आज मीडिया के रूप में स्थापित हो गयी है। मीडिया का तात्पर्य है सोशल मीडिया और यू ट्यूबर्स वगैरह।कई बार सोशल मीडिया का संचालन अपरिपक्व हाथों में होने से बड़ी समस्याएं खड़ी हो जाती है। सोशल मीडिया दोधारी तलवार है। जवाबदेह तथा पारदर्शी पत्रकारिता में ही राष्ट्रधर्म निहित है। पत्रकार में स्वस्थ आलोचनात्मक सोच होनी चाहिए। पत्रकारिता संस्कार के साथ साथ लोकशिक्षण भी है। विश्वसनीयता के चलते पत्रकारिता लोकतंत्र की चौथी संपत्ति भी है । महात्मा गांधी मानते थे कि पत्रकारिता का सामाजिक दायित्व भी है। सेवा इसका स्थाई भाव है। जैसे अनियंत्रित जलधारा तटीय क्षेत्रों को काट देती है और जलमग्न कर देती हैं, वैसे ही अनियंत्रित कलम भी सर्वनाश करती है। जीवंत, स्वतंत्र और आलोचनात्मक समाचार के बिना स्वस्थ लोकतंत्र की कल्पना असंभव है। स्वतंत्र मीडिया प्रहरी के रूप में कार्य करता है। जनमत तैयार करने में पत्रकारिता की खास भूमिका हैं। पाठकों को आकर्षित करने तथा प्रसार बढ़ाने के लिए सनसनीखेज खबरों का उपयोग वर्जित होना चाहिए। ब्रिटिश व्यक्ति जेम्स आगस्टस हिक्की ने पहला अखबार "बंगाल गजट" सच के साथ खड़े रहने की बुनियाद पर ही निकाला था।संकट यह है कि पत्रकारिता मिशन से प्रोफेशन की राह पर चल दी और बाजार उस पर प्रभावी हो गया। बाज़ार में लाभ कमाना है तो संवेदनाओं की तिलांजलि देनी पड़ती है। यूं ही मुनाफा नहीं कमाया जाता।जो पत्रकारिता मानव समाज की दिशा निर्देशिका थी,वह खुद आज बाज़ार की गिरफ्त में हैं। ऐसे में हमारी जिम्मेदारी बनती है कि पत्रकारिता की आत्मा को मरने नहीं दें और समय चक्र के साथ समन्वय भी स्थापित किया जाय।